सुमित चक्रवर्ती का न रहना

कुछ ख़बरें मन को अचानक उदास कर जाती हैं…

आप को अंदाज़ा होता है कि अपने किसी जानने वाले का या आत्मीय का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, फिर भी जब ‘उस’ ख़बर से आप बावस्ता होते हैं तो यक़ीन करना मुश्किल होता है।

मेनस्ट्रीम (Mainstream) के सम्पादक सुमित चक्रवर्ती जी के कल रात हुए देहान्त का समाचार सुन कर ऐसा ही लगा।

लगभग दो-तीन साल पहले ही उनके मोबाइल नम्बर से मेरे पास एक मेसेज आया था, जिसमें लिखने वाले ने यही बताया था कि सुमित जी बीमार रहते हैं और आइन्दा उनसे प्रत्यक्ष संपर्क या बात हो नहीं सकेगी।

वैसे उनके स्वास्थ्य के साथ सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है, इसकी जानकारी मेरे मित्र हर्ष कपूर ने अप्रत्यक्ष तरीके से ही दी थी।

मेनस्ट्रीम में मेरे लिखने से लम्बे समय से परिचित रहे हर्ष ने बताया कि आइंदा अगर मेनस्ट्रीम के लिए लिखना हो तो मेनस्ट्रीम के अलावा मेरे ईमेल पते पर भी भेजा करना।

शायद अपने गिरते स्वास्थ्य को देखते हुए वक्त़ रहते ही उन्होंने हर्ष को यह जिम्मा सौंपा था…

आज की तारीख में पत्रिका का काम किसी भी सूरत में प्रभावित नहीं होना चाहिए, यही उनका प्रमुख सरोकार रहा था,

निखिलदा का एक लेख याद है – जिसका प्रकाशन उनके गुजर जाने के बाद निकले मेनस्ट्रीम के विशेषांक में प्रकाशित उनके कई लेखों में शुमार था – जिसमें उन्होंने पत्रिका के बारे में बताते हुए बेहद निजी बात कही थी

‘आज की तारीख में माता-पिता बच्चों के लिए ढेर सारी जायजाद छोड़ते हैं, मैंने अपने बेटे के लिए कर्ज से लदी यह पत्रिका सौंपी है।’

उसी लेख में पता चला कि सुमित जी किसी बड़ी कम्पनी की अपनी नौकरी छोड़कर पत्रिका के काम में हाथ बटाने आ गए थे।

सुमित जी के जीवन की यही सादगी और पारदर्शिता थी जो हमेशा ही आकर्षित करती थी। उनसे पहली मुलाक़ात अभी भी मन की आंखों पर अंकित है।उन दिनों पत्रिका का दफ्तर झण्डेवालान पर रहता था, शायद 97-98 की बात है।

अपना एक लेख उन्हें देने मैं उनके दफ्तर गया था..

अंदर निखिल दा बैठे थे, उन्होंने लेख लिया, देखा और कहा कि हम लोग छाप देंगे।

मैं नीचे उतरा और निचली सीढ़ी पर ही सुमित जी मिले थे

हाफ शर्ट पहने, चश्मा लगाए और एक कपडे़ का छोटा झोला हाथ में लिए थे

मैंने अपना परिचय दिया और वहां से निकल पड़ा।

मुझे इस बात का कत्तई गुमान नहीं था कि पत्रिका के लिए नियमित लिखने वालों की कतार में मैं भी शुमार होने जा रहा हूं।

कई बार अचानक उनका फोन आता था, ‘मि गाताड़े, आप का लेख हम प्रकाशित कर रहे हैं; आप फलां विषय पर क्यों नहीं लिखते?’

पत्रिका के सालाना अंक के पहले भी उनका फोन आता जिसमें अंक का साइज भी बड़ा होता था और लेख भी बड़े होते थे और वह जोर देते कि मैं ज़रूर लिखूं।

उन दिनों अंग्रेजी भाषा में इकोनोमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली और मेनस्ट्रीम अधिक वैचारिक और खुली पत्रिकाएं मानी जाती थीं, जिनके स्तर की भी प्रशंसा होती थी।

बाद में इंटरनेट के जमाने में कई बार ऐसा हुआ कि मैं अपना लेख किसी वेबसाइट पर या किसी ब्लॉग (kafila.online) पर भेज देता था और उन्हें भी भेज देता था।

मैंने पाया कि वह ऐसे लेख को नहीं छापते थे, जो पत्रिका के लिए ही नहीं लिखा गया हो।

उनसे प्रत्यक्ष मुलाक़ातें बहुत ही कम हुईं। कुछ साल बाद मेनस्ट्रीम का दफ्तर एशियाड ग्राम की तरफ चला गया था, मैं किसी काम से उस तरफ गया था और उन्हें भी मिलने गया था।

जंतर-मंतर पर किसी प्रदर्शन में अचानक एक बुजुर्ग सी महिला ने – जो प्रदर्शन का हिस्सा थीं – अपना परिचय दिया, मैं गार्गी चक्रवर्ती, सुमित जी की पत्नी, आप के बारे में बात होती रहती है।

सुमित जी की ही तरह उनके व्यक्तित्व की सादगी थी।

वह लम्बे समय से एनएफआईए ( NFIW – नेशनल फेडरेशन ऑफ़ इंडियन वीमेन) से जुड़ी थीं।

वैसे सुमित जी का पूरा परिवार कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़ा था

उनकी मां रेणु चक्रवर्ती कभी सांसद भी रह चुकी हैं और उनके पिता निखिल चक्रवर्ती भी पहले सीपीआई के सक्रिय सदस्य थे और बाद में उन्होंने पत्रकारिता की तरफ अपना रूख किया था।

अलविदा सुमित दा

आज के दौर में आप के जैसे प्रतिबद्ध और पारदर्शी और साहसी पत्रकारों और जन बुद्धिजीवियों की बहुत आवश्यकता थी, जो सत्ता के सामने सच का इजहार करने से कभी नहीं संकोच करते।

(सुभाष गाताडे लेखक, अनुवादक, न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव (एनएसआई) से संबद्ध वामपंथी कार्यकर्ता हैं।)

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